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Lalitha Tripur Sundari Sadhna

1) माँ ललिता त्रिपुरा सुन्दरी का देव-तत्त्व 

माँ ललिता को आदि-पराशक्ति कहा गया है—वे ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार की अधिष्ठात्री हैं।
“त्रिपुरा” का अर्थ है—तीन लोक, तीन अवस्था (जाग्रत–स्वप्न–सुषुप्ति), और तीन गुण (सत्त्व–रजस्–तमस्)।
“सुन्दरी” का अर्थ—परम सौंदर्य, जो बाह्य रूप नहीं बल्कि चैतन्य का सौंदर्य है।

  • वे शिव की शक्ति हैं—शिव बिना शक्ति के निष्क्रिय, और शक्ति बिना शिव के दिशाहीन मानी गई है।

  • श्रीचक्र (श्रीयंत्र) उनकी साक्षात् मूर्ति है—यंत्र = शरीर, मंत्र = प्राण, तत्त्व = चैतन्य।

2) स्वरूप-वर्णन 

  • वर्ण: कांति युक्त (स्वर्ण/अरुण)

  • आसन: कमल पर विराजमान

  • भुजाएँ (4):

    1. गन्ने का धनुष – मन (इच्छा-शक्ति)

    2. पाश – आसक्ति/बंधन पर नियंत्रण

    3. अंकुश – मन का अनुशासन

    4. पुष्प-बाण – इन्द्रियों का शोधन

  • पादपीठ: शिव तत्त्व पर आरूढ़—यह बताता है कि शक्ति शिव पर अधिष्ठित है।

  • मुकुट/आभूषण: ज्ञान, ऐश्वर्य और पूर्णता के प्रतीक।

3) श्रीविद्या और श्रीचक्र का महत्व

श्रीचक्र नौ आवरणों से बना है—हर आवरण एक साधना-स्तर है।

  1. त्रैलोक्य मोहन

  2. सर्वाशा परिपूरक

  3. सर्वसंक्षोभण

  4. सर्वसौभाग्यदायक

  5. सर्वार्थसाधक

  6. सर्वरक्षाकर

  7. सर्वरोगहर

  8. सर्वसिद्धिप्रद

  9. बिन्दु (महात्रिपुरसुन्दरी)

साधना का लक्ष्य—बिन्दु में लीन होकर अहंकार-नाश और आत्मसाक्षात्कार।

4) साधना का उद्देश्य

  • मन की शुद्धि

  • इच्छा–ज्ञान–क्रिया शक्तियों का संतुलन

  • आत्मिक उन्नति, शांति और विवेक

  • गृहस्थ के लिए—सौभाग्य, संतुलन, समृद्धि

यह साधना भोग-विलास नहीं, बल्कि संयम और सौंदर्य-बोध की साधना है।

5) साधना के लिए आवश्यक नियम

  1. गुरु-दीक्षा (अत्यंत आवश्यक)

  2. शुद्ध आहार-विहार, ब्रह्मचर्य/संयम

  3. नियमित समय (प्रातः ब्रह्ममुहूर्त/रात्रि)

  4. श्रद्धा, मौन, एकाग्रता

6) सरल प्रारम्भिक साधना-विधि (गृहस्थ हेतु)

यह “उपासनात्मक” विधि है, तांत्रिक दीक्षा-रहित व्यक्ति के लिए सुरक्षित मानी जाती है।

  • माँ ललिता का चित्र/श्रीयंत्र

  • दीप, धूप, पुष्प, नैवेद्य

  • लाल/गुलाबी पुष्प

(ख) ध्यान

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं मातः त्रिपुरसुन्दरि नमः।

माँ को कमल पर विराजमान, शांत मुस्कान के साथ ध्यान करें।

(ग) जप

  • मंत्र:
    “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः”

  • माला: स्फटिक/कमलगट्टा

  • संख्या: 108 (न्यूनतम)

(घ) स्तुति

  • ललिता सहस्रनाम (सम्भव हो तो)

  • अथवा 11 बार यह प्रार्थना—

माँ ललिते! मेरे मन, वाणी और कर्म को शुद्ध करो।

7) साधना में अनुभव (सामान्य संकेत)

  • मन में शांति, सौंदर्य-बोध

  • क्रोध/अस्थिरता में कमी

  • स्वप्न में कमल/ज्योति/स्त्री-आकृति

  • जीवन में संतुलन

भय, अहंकार या त्वरित सिद्धि की इच्छा साधना में बाधक है।

8) सावधानियाँ

  • बिना गुरु के बीज-मंत्रों की तांत्रिक प्रयोगात्मक साधना न करें

  • किसी को नीचा दिखाने/वशीकरण की भावना न रखें

  • साधना को गोपनीय रखें

9) निष्कर्ष

माँ ललिता त्रिपुरा सुन्दरी की साधना
सौंदर्य + शांति + ज्ञान की साधना है।
यह साधक को बाह्य आकर्षण से आंतरिक आनन्द की ओर ले जाती है।

माँ ललिता त्रिपुरा सुन्दरी की साधना बिना गुरु-दीक्षा के नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वे दस महाविद्याओं में से एक परम गूढ़ देवी हैं। इनके तीन प्रमुख स्वरूप माने गए हैं और प्रत्येक स्वरूप की साधना के लिए साधक की पात्रता तथा मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक होता है। किसी भी प्रकार की साधना आरम्भ करने से पूर्व योग्य, सिद्ध और परंपरागत गुरु से दीक्षा लेना अनिवार्य है, तथा साधना के सम्पूर्ण काल में गुरु के निरन्तर संपर्क और संरक्षण में रहना चाहिए। साधना के दौरान यदि कोई उग्र शक्ति का अनुभव, ऊर्जा असंतुलन, या मंत्र-विधि में त्रुटि हो जाए, तो केवल गुरु ही उसे संभाल सकते हैं; साधक को अपने स्तर पर कोई भी निर्णय या प्रयोग नहीं करना चाहिए। माँ ललिता त्रिपुरा सुन्दरी की साधना कुछ परंपराओं में तामसिक अथवा अघोर पद्धति से भी की जाती है, किन्तु ऐसी साधनाएँ पूर्णतः गुप्त होती हैं और सार्वजनिक मंचों या वेबसाइटों पर प्रकट नहीं की जातीं। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि श्रीविद्या और महाविद्या की साधना प्रकाश के लिए नहीं, अपितु गोपनीयता, अनुशासन और गुरु-कृपा के लिए होती है। 🙏

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