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जुम्मा मेहतरानी साधना       (Jumma Mehtrani Sadhana)

jumma mehtrani

 

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जुम्मा मेहतरानी साधना

यह साधना अमावस्या से या कृष्ण पक्ष की सप्तमी से आरम्भ की जाती है। समय रात्रि 11 बजे के बाद का माना गया है। स्थान नदी-किनारा या श्मशान के आसपास का एकांत स्थल होना चाहिए।

रात्रि में स्नान करके शुद्ध होकर बैठना चाहिए। निर्वस्त्र होकर केवल मर्यादा हेतु बिना सिला हुआ काला कपड़ा शरीर पर लपेट लेना चाहिए।

सामग्री में मिट्टी का दीपक, फूल-माला, मदिरा, मांस, मछली, मीठा फल, नारियल आदि रखे जाते हैं।

साधना में 21 दाँतों की माला धारण करने का उल्लेख मिलता है। यह कहा जाता है कि ये दाँत सुअर (पालित/शहरी, जो सामान्य रूप से बाज़ार में उपलब्ध हो) के होने चाहिए। दीपक में उसी की चर्बी का प्रयोग करने का वर्णन मिलता है, ताकि साधना-काल तक दीपक निरंतर जलता रहे।

दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठकर मंत्र का जाप करना चाहिए।

यदि पूर्णिमा की चौदस से आरम्भ करें तो अमावस्या तक 21,000 मंत्र-जप पूर्ण हो जाने चाहिए। साधना-काल में देवी का आगमन किसी भी दिन हो सकता है — ऐसी लोक-मान्यता कही जाती है।

जो व्यक्ति जात-पात या ऊँच-नीच की भावना रखता हो, उसे यह साधना नहीं करनी चाहिए।

 

sadhna mantra

 

प्रयोग मंत्र

सात समुंदर एले पार, सात समुंदर पेल पार,
बीच में टापू, टापू में अखरोट का पेड़।
उस पर बैठी जुम्मा मेहतरानी।
जुम्मा मेहतरानी क्या करती।
झारेगी, झोंरेगी, फलों का भेद बताएगी,
आने-जाने वाले हर व्यक्ति का भेद बताएगी,
भूत, भविष्य, वर्तमान बताएगी।
इसी घड़ी मेरा काज करेगी, नहीं आवेगी
तो जुम्मा मेहतरानी नदी कहलायेगी।
मसाण के संग सुसाम करेगी।
सत्य नाम आदेश गुरु का॥

 

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 साधना संबंधी गंभीर चेतावनी

यह साधना अत्यंत गूढ़, उग्र और तांत्रिक प्रकृति की मानी जाती है। इसे किसी भी स्थिति में बिना योग्य, सिद्ध और अनुभवी गुरु की आज्ञा तथा दीक्षा के नहीं करना चाहिए।

बिना गुरु-दीक्षा के की गई साधना साधक के मानसिक, आध्यात्मिक और ऊर्जात्मक संतुलन को प्रभावित कर सकती है। तंत्रमार्ग खेल नहीं है — इसमें शुद्ध आचरण, नियम, संयम और गुरु-रक्षा अनिवार्य मानी गई है।

जो साधक केवल जिज्ञासा, अहंकार, प्रयोग या शक्ति-प्रदर्शन की भावना से ऐसी साधना करता है, उसे विपरीत परिणाम भी प्राप्त हो सकते हैं।

अतः पहले योग्य गुरु से विधिवत दीक्षा लें, नियम समझें, संरक्षण प्राप्त करें — उसके पश्चात ही किसी भी उग्र साधना में प्रवेश करें।

गुरु बिना तंत्र अधूरा है, और अधूरा तंत्र साधक के लिए घातक हो सकता है।

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